
आज की इस डिजिटल दुनिया में जहाँ देखो वहाँ डिजिटल संसाधनों का बोलबाला है। देखते ही देखते शब्दकोश (Dictionaries), हाथ से लिखी हुई टेलीफोन डायरियाँ और कुछ समझ न आने पर अपनों से पूछने की आदत—सब कुछ बदल रहा है। इन सब के बीच एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है कि “क्या हमारी सोचने की शक्ति कम हो रही है?”
क्या वास्तव में हम अपनी मानसिक क्षमता खो रहे हैं?
आइए, कुछ उदाहरणों से इसे समझते हैं।
उदाहरण 1: शब्दकोश बनाम इंटरनेट पहले जब हमें किसी शब्द का अर्थ पता नहीं होता था, तो हम शब्दकोश (Dictionary) का उपयोग करते थे। उस एक शब्द को ढूँढने के दौरान हमारी नज़र दो-चार अन्य नए शब्दों पर भी पड़ती थी, जिससे वे शब्द हमारी स्मृति (Memory) में जुड़ जाते थे और बुद्धि का विकास होता था।
पर अब हम इंटरनेट पर सीधा अर्थ खोजते हैं। इससे हमें जानकारी तो तुरंत मिल जाती है, लेकिन हमारी “खोजने की प्रवृत्ति” और धैर्य धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।
उदाहरण 2: रचनात्मकता बनाम कॉपी-पेस्ट पहले जब बच्चों को स्कूल में लेख (Article) लिखने को कहा जाता था, तो वे उसके लिए बहुत प्रयास करते थे। बड़ों से सलाह लेते थे, पुस्तकालय में किताबें पढ़ते थे और फिर उसे अपने शब्दों में ढालते थे। इससे उनकी बुद्धि विकसित होती थी।
पर अब इंटरनेट से बना-बनाया लेख ढूँढकर ‘कॉपी-पेस्ट’ करने का मॉडल चल पड़ा है। अगर मेहनत ही नहीं होगी, तो बुद्धि का विकास कैसे संभव है?
उदाहरण 3: आपसी संवाद बनाम मैप्स पहले कहीं जाने के लिए जब रास्ता पता नहीं होता था, तो हम एक-दूसरे से पूछते थे। इससे न केवल दिमाग सक्रिय रहता था, बल्कि लोगों से मेल-मिलाप भी बढ़ता था। पर अब हम पूरी तरह ‘मैप्स’ पर निर्भर हैं। हम बिना सोचे बस तकनीक के बताए रास्ते पर चलते रहते हैं।
उदाहरण 4: टेलीफोन डायरी और याददाश्त का खोना
लैंडलाइन के दौर में हर घर में एक छोटी टेलीफोन डायरी होती थी। महत्वपूर्ण नंबर हमें ज़ुबानी याद रहते थे क्योंकि हम उन्हें बार-बार डायल करते थे। अगर डायरी खो भी जाए, तो दिमाग इतना सक्षम था कि ज़रूरी नंबरों को तुरंत रिकॉल (Recall) कर लेता था।
आज हमारे मोबाइल में हज़ारों कॉन्टैक्ट्स हैं, लेकिन शायद ही हमें अपने करीबी ५ मित्रों के नंबर भी याद हों। हम केवल नाम सर्च करते हैं और कॉल बटन दबा देते हैं। इतना ही नहीं, अब तो हम रिश्तेदारों के पते तक भूलने लगे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि हमारी सोचने की शक्ति कम हो रही है।
डिजिटल निर्भरता: एक मानसिक जाल
हमारी यह निर्भरता केवल सूचनाओं तक सीमित नहीं है, यह हमारे दैनिक व्यवहार में भी घुस चुकी है:
- गणना (Calculation): आज 23+23 जैसा साधारण जोड़ करने के लिए भी हम तुरंत कैलकुलेटर खोल लेते हैं। हमारे मस्तिष्क की गणितीय क्षमता जंग खा रही है।
- पूर्ण निर्भरता: सुबह अलार्म बजने से लेकर रात को सोने से पहले तक, हमारी हर क्रिया इंटरनेट और ऐप्स द्वारा नियंत्रित है।
- धैर्य की कमी: तकनीक ने हमें ‘इंस्टेंट’ परिणाम का आदी बना दिया है, जिससे हमारी सोचने और गहराई से विचार करने की क्षमता (Deep Thinking) कम हो गई है।
इंसानी मस्तिष्क की असीम शक्ति

मानव मस्तिष्क अपने आप में एक ‘सुपर कंप्यूटर’ है। इसी मस्तिष्क की शक्ति से मनुष्य ने शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है। आदिमानव से लेकर आधुनिक मानव तक की प्रगति किसी तकनीक की नहीं, बल्कि ‘मानव चिंतन’ की देन है।
ज़रा सोचिए! क्या दुनिया के महान आविष्कार, विशाल ग्रंथ और कविताएँ इंटरनेट के भरोसे लिखी गई थीं? क्या आइंस्टीन, न्यूटन, महान इंजीनियर सर एम. विश्वेश्वरैया, सी.वी. रमन या हमारे प्रिय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे वैज्ञानिकों ने एआई (AI) पर निर्भर होकर सफलता पाई थी? बिल्कुल नहीं! उनकी महानता का आधार उनका अपना स्वतंत्र चिंतन और तर्कशक्ति थी।
निष्कर्ष
अगर हालात ऐसे ही चलते रहे, तो डिजिटल निर्भरता हमें एक दिन ‘हीरो से जीरो‘ बना देगी। आज इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि यदि एक बच्चे को अपनी माँ पर दस पंक्तियाँ लिखने को कहा जाए, तो वह अपने मन के भाव नहीं लिखेगा, बल्कि इंटरनेट पर खोजेगा कि “माँ क्या है?” (What is mother?)।
जीवन का अर्थ ही है निरंतर चलते रहना और सकारात्मक बदलावों को अपनाना। तकनीक हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए है, लेकिन जब इसकी निर्भरता हद से बाहर हो जाती है, तो यह मानव पर भारी पड़ सकती है।
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