
गिरफ्तारी का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में पुलिस, हथकड़ियाँ और जेल की तस्वीर उभरने लगती है, लेकिन आज के इस डिजिटल युग में अपराधियों ने डर फैलाने का एक नया और खतरनाक तरीका निकाल लिया है जिसे “डिजिटल अरेस्ट” कहा जाता है।
असल में कानून में डिजिटल अरेस्ट, इसका कोई अस्तित्व नहीं है, बल्कि यह महज एक मनोवैज्ञानिक ठगी है जिसमें डिजिटल तकनीक और कानूनी डर का सहारा लेकर निर्दोष लोगों को लूटा जाता है।
इस लेख में हम इस नए तरह के साइबर अपराध की हर एक बारीकी को विस्तार से समझेंगे ताकि आप और आपका परिवार सुरक्षित रह सके।
डिजिटल अरेस्ट क्या है?
सबसे पहले यह स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है कि भारत के किसी भी कानून (चाहे वह बीएनएस हो या सीआरपीसी) में “डिजिटल अरेस्ट” जैसा कोई शब्द या प्रावधान नहीं है। यह पूरी तरह से एक साइबर-मनोवैज्ञानिक अपराध (Cyber-Psychological Crime) है।
इस घोटाले में, ठग (scammers) खुद को सीबीआई (CBI), नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB), प्रवर्तन निदेशालय (ED), या राज्य पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी बताकर वीडियो कॉल करते हैं। वे आपसे कहते हैं कि आपके नाम पर एक ऐसा पार्सल पकड़ा गया है जिसमें ड्रग्स, नकली पासपोर्ट, या अवैध हथियार मिले हैं।
आपको डराने के लिए वे कहेंगे कि आप पर “मनी लॉन्ड्रिंग” या “आतंकवादी फंडिंग” का केस दर्ज हुआ है। “ये शब्द इतने भारी होते हैं कि आम आदमी का दिमाग सुन्न हो जाता है।” इसके बाद, वे आपको स्काइप (Skype) या व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर रहने का आदेश देते हैं और कहते हैं कि जब तक “डिजिटल जांच” पूरी नहीं होती, आप कैमरे के सामने से नहीं हट सकते। इसी स्थिति को वे डिजिटल अरेस्ट कहते हैं, जहाँ आप अपने ही घर में एक डिजिटल कैदी बन जाते हैं।
ठग किस तरह के लोगों को निशाना बनाते हैं और क्यों?

ठग हमेशा उन लोगों की तलाश में रहते हैं जिन्हें कानूनी पेचीदगियों की कम जानकारी हो। उनके मुख्य निशाने निम्नलिखित होते हैं:
- वरिष्ठ नागरिक (Senior Citizens): बुजुर्ग लोग अक्सर तकनीक से उतने परिचित नहीं होते और कानून-पुलिस का नाम सुनते ही घबरा जाते हैं। अपराधी उनके इसी भोलेपन और डर का फायदा उठाते हैं।
- नौकरीपेशा लोग (Working Professionals): जो लोग प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करते हैं, उन्हें सामाजिक बदनामी का डर दिखाया जाता है। उन्हें लगता है कि अगर पुलिस उनके घर आई या उनका नाम किसी ड्रग्स केस में आया, तो उनका करियर तबाह हो जाएगा।
- छात्र (Students): युवाओं को उनके भविष्य और विदेश जाने के सपनों का डर दिखाकर उनसे पैसे ठगे जाते हैं।
- अकेले रहने वाले लोग: जो लोग घर में अकेले होते हैं, उनके पास तुरंत सलाह लेने के लिए कोई नहीं होता, इसलिए वे ठगों की बातों में आसानी से आ जाते हैं।
वे ऐसा क्यों करते हैं? इसका सबसे बड़ा कारण है “आपात स्थिति” (Sense of Urgency) पैदा करना। वे आपको सोचने या किसी से सलाह लेने का वक्त नहीं देते ताकि आपका विवेक काम न कर सके।
इस घोटाले को पहचानने के मुख्य संकेत
यदि आपको कभी ऐसा कॉल आए, तो इन संकेतों पर ध्यान दें:
- अज्ञात अंतरराष्ट्रीय कॉल: कॉल अक्सर +92 या किसी अन्य देश के कोड से आते हैं, लेकिन वे स्क्रीन पर “पुलिस कंट्रोल रूम” या “CBI कार्यालय” जैसा नाम दिखा सकते हैं।
- नकली सेटअप: वीडियो कॉल पर पीछे का बैकग्राउंड किसी असली पुलिस स्टेशन जैसा लगता है और ठग वर्दी में होते हैं। लेकिन ध्यान से देखने पर वह बनावटी लग सकता है।
- निरंतर निगरानी: वे आपसे कहेंगे कि आप अपना फोन नहीं काटेंगे और कैमरे के सामने से बिल्कुल नहीं हटेंगे।
- पैसों की तत्काल मांग: वे आपसे “सुप्रीम कोर्ट” या “आरबीआई” के नाम पर ‘सिक्योरिटी डिपॉजिट’ मांगेंगे ताकि आपका केस “साफ़” (Clearance) हो सके।
सरकारी चेतावनी और बचाव के नियम
भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने इस पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं:
- कानूनी गिरफ्तारी का नियम: किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी हमेशा भौतिक उपस्थिति (Physical Presence) में होती है। पुलिस को गिरफ्तारी वारंट और अरेस्ट मेमो दिखाना होता है। वीडियो कॉल पर कोई कानूनी गिरफ्तारी नहीं होती।
- फोन पर पैसों का लेनदेन नहीं: कोई भी सरकारी एजेंसी (CBI, ED, Police) आपसे फोन पर या वीडियो कॉल पर पैसे ट्रांसफर करने को कभी नहीं कहेगी।
- चक्षु पोर्टल (Chakshu Portal): संचार साथी पोर्टल पर उपलब्ध ‘चक्षु’ फीचर का उपयोग करके आप ऐसे संदिग्ध नंबरों की रिपोर्ट तुरंत कर सकते हैं।
यदि आप इस जाल में फंस जाएं तो क्या करें?
डर के मारे कोई गलत कदम न उठाएं, बल्कि इन चरणों का पालन करें:
- कॉल तुरंत काट दें: बिना कोई सफाई दिए तुरंत वीडियो कॉल बंद करें और उस नंबर को ब्लॉक करें।
- घबराएं नहीं: याद रखें कि यह एक धोखाधड़ी है। असली पुलिस आपके घर आएगी, वीडियो कॉल नहीं करेगी।
- परिवार को सूचित करें: तुरंत अपने किसी भरोसेमंद मित्र या रिश्तेदार को पूरी बात बताएं। अकेले इस दबाव को न झेलें।
- साइबर क्राइम हेल्पलाइन (1930): तुरंत 1930 नंबर पर कॉल करके अपनी शिकायत दर्ज करें या www.cybercrime.gov.in पर लॉग-इन करें।
- बैंक को सूचित करें: यदि आपने गलती से कोई पैसा ट्रांसफर कर दिया है, तो तुरंत अपने बैंक को सूचित करें ताकि वे उस लेनदेन को रोक सकें।
निष्कर्ष: जागरूक रहें, निश्चिंत रहिए
अंत में, बस इतना ही याद रखें कि जागरूक रहें, निश्चिंत रहिए। आज के इस डिजिटल युग में सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है। क्योंकि जब कानून की नज़र में डिजिटल अरेस्ट क्या है, इसका कोई वजूद ही नहीं है, तो फिर किसी भी अज्ञात वीडियो कॉल से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। हमें डिजिटल तकनीक का लाभ तो उठाना चाहिए, पर साथ ही साइबर कानूनों और अपने अधिकारों के बारे में भी जानकारी रखनी चाहिए।
सतर्क रहिए और सुरक्षित रहिए!