
आज हम सबको तेज़ और सस्ता इंटरनेट लगभग हर जगह आसानी से मिल जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि 30 साल पहले **भारत में इंटरनेट का सफर** क्या था? चलिए, आज मैं आपको अपने अनुभव के आधार पर उस दौर की झलक दिखाता हूँ — जब इंटरनेट एक लग्ज़री माना जाता था, और हर मिनट का हिसाब रखा जाता था।
1995: भारत में इंटरनेट के सफर की शुरुआत
भारत में आम जनता के लिए इंटरनेट सेवा 15 अगस्त 1995 को VSNL (जो अब BSNL का हिस्सा है) द्वारा शुरू की गई थी। शुरुआती दिनों में ये सेवाएं सिर्फ़ यूनिवर्सिटी और रिसर्च सेंटर्स तक सीमित थीं, और धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुँचना शुरू हुईं।
2001 में मेरा इंटरनेट का सफर शुरू
मेरा इंटरनेट से जुड़ाव 2001 में हुआ, जब इसे इस्तेमाल करना ही एक चुनौती थी।
इंटरनेट चलाने के लिए तीन चीज़ें अनिवार्य थीं:
- टेलीफोन कनेक्शन
- मॉडेम-MoDem (Modulator-Demodulator)
- ISP- Internet Service Provider (10 घंटे के लिए ₹150)
फ़ोन लाइन के ज़रिए इंटरनेट सिग्नल एनालॉग फॉर्मेट में आते थे और मॉडेम उनका डिजिटल में रूपांतरण करता था, ताकि कंप्यूटर उन्हें समझ सके।
डायल-अप कनेक्शन और “बीप बीप” की वो आवाज़
नेट से जुड़ने के लिए डायल-अप कनेक्शन का इस्तेमाल होता था — एक नंबर डायल करना पड़ता था, फिर यूज़रनेम और पासवर्ड डालने के बाद ‘बीप-बीप-कर्र-कर्र’ जैसी आवाज़ आती थी और इंटरनेट चालू हो जाता था। शुरुआती स्पीड? सिर्फ़ 14.4 kbps!
इंटरनेट का सीमित और महँगा उपयोग
तब इंटरनेट का उपयोग ज़्यादातर ईमेल भेजने, Yahoo या Rediff जैसी वेबसाइट्स ब्राउज़ करने या इमेजेस डाउनलोड करने तक सीमित था।
पर याद रखिए — जैसे ही इंटरनेट कनेक्ट हुआ, चार्ज शुरू!
- एक मिनट का टेलीफ़ोन बिल: ₹1.5
- ऊपर से ISP का चार्ज अलग
- औसतन 1 घंटे का इंटरनेट इस्तेमाल = ₹90!
इसलिए लोग उतना ही नेट इस्तेमाल करते थे, जितनी ज़रूरत हो — कोई YouTube, Netflix, Reels नहीं!
जब इंटरनेट को लोग ‘जादुई मशीन’ समझते थे!
उस ज़माने में बहुत से लोग इंटरनेट को समझ नहीं पाते थे। मेरे नानाजी को किसी ने कहा, “इंटरनेट से आप कभी भी किसी भी हीरोइन की तस्वीर स्क्रीन पर देख सकते हैं।”
नानाजी बोले, “मतलब ये कि जब चाहो बुला लो, वो सामने आ जाएँगी? ये भी कोई बात हुई!”
कितनी मासूम सोच थी, है ना?
मोबाइल में इंटरनेट का सफर: R-World और 2G
2003-2005 के बीच कुछ मोबाइल कंपनियों जैसे Reliance ने R-World जैसी सेवाएं शुरू कीं, जिससे मोबाइल में सीमित इंटरनेट यूज़ संभव हुआ। इसके बाद 3G, फिर 4G और अब 5G का दौर आ गया।
2008 के आसपास BSNL ने ब्रॉडबैंड की शुरुआत की — ₹750 के मासिक प्लान में सिर्फ़ 5GB डेटा मिलता था। उसके बाद स्पीड कम हो जाती थी।
Reliance Jio: इंटरनेट क्रांति
5 सितंबर 2016 को Reliance Jio ने जब 4G डेटा 1.5GB/day मुफ्त देना शुरू किया, तो पूरा गेम ही बदल गया। पहले लोग महीने में 1GB सोच-समझकर चलाते थे, अब रोज़ 1.5GB खत्म भी कम लगने लगा!
6 महीने तक Jio की फ्री सर्विस ने इंटरनेट को घर-घर पहुँचा दिया — लोग अब नेट बंद रखना भूल गए।
सोचने वाली बात
पहले जब इंटरनेट महँगा था, लोग उसका इस्तेमाल सोच-समझ कर करते थे। अब जब डेटा सस्ता और असीमित हो गया है, तो भी हम चैन से नहीं रहते — उलटा डेटा कम पड़ने की शिकायत करते हैं।
निष्कर्ष:
इंसान की फ़ितरत ही ऐसी है — जब सुविधा कम होती है, तो वो उसमें भी खुश रह लेता है। लेकिन जब ज़्यादा मिलती है, तब भी संतुष्ट नहीं होता। **भारत में इंटरनेट का सफर** सिर्फ़ तकनीकी नहीं, एक मानसिक बदलाव का भी प्रतीक है। तो अगली बार जब आप एक दिन में 2GB डेटा खत्म कर दें — एक बार उस दौर को याद करिए, जब 10 मिनट नेट चलाने पर ₹15 लगते थे!
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