
शादी में मेहमान और खाना — ये दोनों ऐसे विषय हैं जिन पर हमेशा किस्से बनते रहते हैं। पिछले लेख में हमने बात की थी कि आजकल घर का खाना क्यों बेस्वाद लगता है। और शायद इसी वजह से जब किसी शादी, पार्टी या फंक्शन का न्योता आता है तो लगता है —
“वाह! आज न तो खाना बनाने की झंझट और न ही वही रोज़ का बेस्वाद घर का खाना। चलो, आज दावत उड़ाई जाए।”
शादी की तैयारी और गिनती की गड़बड़
मेरे एक करीबी परिवार में शादी थी। पहला बड़ा function था, तो स्वाभाविक था कि तैयारी भी ज़ोर-शोर से हो रही थी। गेस्ट लिस्ट करीब 1000 लोगों की बनाई गई थी।
लेकिन क्योंकि शादी हॉल घर के पास ही था, मोहल्ले वाले पीछे कैसे रहते? कई पड़ोसियों ने तो घर पर ताला लगाकर पूरे परिवार समेत धावा बोल दिया। देखते-ही-देखते गिनती 1000 से बढ़कर 1500+ हो गई, और असली मुश्किल यहीं से शुरू हुई।
जब खाने की प्लेटें कम पड़ गईं…
पहले शादियों में बावर्ची (खाना बनाने वाले) होते थे। अगर मेहमान ज़्यादा आ जाते तो वे तुरंत मैनेज कर लेते थे। बावर्ची लोग हमेशा सेफ़ साइड के लिए एक बड़ा हांडी में पानी उबालकर रखते थे। ज़रूरत पड़ते ही उसी उबलते पानी में चावल या दाल डालकर झटपट नया खाना तैयार हो जाता था। सबको पेटभर खिलाने का जुगाड़ हमेशा निकल ही आता था।
लेकिन अब वो सिस्टम धीरे-धीरे ख़त्म हो गया है। आजकल catering का जमाना है, जहाँ plates के हिसाब से order दिया जाता है।
Caterers का हिसाब सीधा है —
जितनी plates का order, उतना ही खाना।

सोचा गया था कि 1000 plates काफी होंगी। लेकिन जैसे ही plates का हिसाब हाथ से निकल गया, तो माहौल बिगड़ना तय था। कुछ लोगों को खाना नहीं मिला, कुछ को आधा-अधूरा मिला।
और फिर वही हुआ जो अक्सर functions में होता है —
गेस्ट बोले → “इतना बड़ा function था, और खाना भी ठीक से manage नहीं कर पाए!”
Caterers ने तुरंत जवाब दिया → “भाई साहब, order तो 1000 plates का था, हम extra plates कहीं छुपाकर थोड़े लाए हैं!”
इसके बाद payment को लेकर खूब खींचतान हुई और कुछ देर के लिए माहौल शादी वाले हॉल से ज़्यादा पंचायत जैसा लगने लगा।
शादी में गेस्ट – हकीकत की झलक

शादी-ब्याह में मेहमानों का अपना-अपना अंदाज़ होता है।
- कोई चाट और स्टार्टर में इतना व्यस्त हो जाता है कि main course तक पहुँचते-पहुँचते पेट भर चुका होता है।
- कुछ लोग खाने से ज्यादा हर डिश की फोटो खींचने और insta पर डालने में expert होते हैं।
- मिठाई का काउंटर तो वैसे भी सबसे बड़ा आकर्षण होता है — वहाँ हमेशा सबसे लंबी लाइन दिखती है।
- और कुछ लोग हर function में compare करना नहीं भूलते — “पिछली बार वाले खाने का taste थोड़ा better था।”
यानी शादी सिर्फ खाने की दावत नहीं, बल्कि मेहमानों की entertaining आदतों का एक live शो भी होती है।
शादी का असली गणित
शादी का गणित कभी सीधा तो कभी उल्टा पड़ता है। हम जितनी भी गणना कर लें, मेहमान कभी ज़्यादा आ जाते हैं तो कभी कम। क्योंकि यह असली ज़िंदगी का हिसाब है — यहाँ 2+2 हमेशा चारनहीं, कुछ औरही होता है।
ऊपर वाले किस्से में गेस्ट उम्मीद से ज़्यादा आए थे। लेकिन कई बार उल्टा भी हो जाता है — बहुत तैयारी के बाद आधे लोग ही आते हैं और खाना ढेर सारा बच जाता है। दोनों ही हालात एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
सबसे बुरा लगता है जब खाना बर्बाद होता है।
सच कहूँ तो शादियों में सबसे बुरा तब लगता है जब लोग आधा-अधूरा खाकर प्लेट यूँ ही छोड़ देते हैं। एक तैयार थाली हाथ तक पहुँचने से पहले कितनों की मेहनत लगती है — किसान, व्यापारी, खरीदने वाले, और फिर उसे पकाकर परोसने वाले की।
इतना कीमती खाना अगर हम waste करें तो ये सिर्फ बुरा ही नहीं लगता, बल्कि ये तो सीधे-सीधे खाने का अपमान है। बेहतर यही है कि जितनी भूख हो, उससे थोड़ी कम मात्रा ही प्लेट में लें। न खाना बचेगा, न बुरा लगेगा।
शादी के किस्सों की मज़ेदार दुनिया
मानना पड़ेगा — शादी के किस्से हमेशा मजेदार होते हैं। अभी तो बस खाने की बात हुई है, वरना और भी ढेर सारी बातें हैं जिन पर कभी अलग से चर्चा करेंगे।
आखिर में, शादी का लड्डू वही चीज़ है —
खाओ तो भी पछताओ, और न खाओ तो भी पछताओ। फर्क बस इतना है कि कोई खाकर पछताता है, तो कोई न खाकर।
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