
बच्चों को कहानी क्यों सुनानी चाहिए? यह सवाल आज के डिजिटल युग में और भी महत्वपूर्ण हो गया है। कहानी सुनाना और उसे ध्यान से सुनना भी अपने आप में एक कला है। बचपन में दादी-नानी की कहानियाँ सुनने का सौभाग्य शायद हममें से कई लोगों को मिला होगा। आज भी जब बच्चे अपने दादा-दादी या नाना-नानी से कहानी सुनते हैं, तो उनके चेहरे की मुस्कान देखने लायक होती है। ख़ासकर रात को सोते समय कहानी सुनते-सुनते नींद आ जाना, अपने आप में एक अनोखा अनुभव है।
कहानी सुनाने के वैज्ञानिक आधार और फायदे
जब हम बच्चों को कहानी सुनाते हैं, तो उनके मस्तिष्क में उस कहानी का एक ऑडियो और वीडियो जैसा प्रभाव पड़ता है। अलग-अलग स्थितियों पर उनके चेहरे के भाव बदलते हैं, जो ये दर्शाता है कि उनका दिमाग कहानी को गहराई से अनुभव कर रहा है।
सुनाई गई कहानी धीरे-धीरे बच्चे के दिमाग में रिकॉर्ड होती है। और जब हम उनसे अगले दिन वही कहानी पूछते हैं, तो वह उसे याद करने की कोशिश करते हैं – यही मेमोरी रिकॉल की शुरुआत होती है। इससे बचपन में ही बुद्धि का विकास होना शुरू हो जाता है।
बच्चों की रचनात्मकता (Creativity) कैसे बढ़ती है?
अगर आप बच्चे से कहें कि आज तुम ही कोई कहानी सुनाओ, तो शुरू में वह संकोच करेगा। लेकिन जैसे ही उसे चॉकलेट या पसंदीदा मिठाई का लालच मिलेगा, वह सोचने लगेगा – और जो कहानी उसने सुनी नहीं है, वह खुद से एक बनाकर सुनाने लगेगा। चाहे वह तर्कपूर्ण हो या नहीं, मगर यह प्रयास ही उसकी रचनात्मकता (creativity) को जन्म देता है। यही कारण है कि बच्चों को कहानी क्यों सुनानी चाहिए इस सवाल का एक महत्वपूर्ण जवाब है।
बच्चों का भावनात्मक विकास और भाषा कौशल
कहानियाँ केवल मस्तिष्क के विकास में ही मदद नहीं करतीं, बल्कि वे बच्चों के भावनात्मक विकास का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। जब बच्चे कहानियों में खुशी, दुख, डर या बहादुरी जैसे भावों को देखते हैं, तो वे इन भावनाओं को पहचानना और समझना सीखते हैं। यह उन्हें दूसरों के प्रति सहानुभूति विकसित करने में मदद करता है। कहानी सुनाने से बच्चों की शब्दावली (vocabulary) भी बढ़ती है। वे नए शब्द सीखते हैं, वाक्यों की संरचना को समझते हैं और अपनी बात को बेहतर ढंग से व्यक्त करना सीखते हैं।
स्मृति (Memory) को कैसे निखारें?
कई विशेषज्ञ कहते हैं कि बच्चे का व्यक्तित्व 3-5 साल की उम्र में ही आकार लेने लगता है। इतना ही नहीं, कॉम्प्लान जैसे विज्ञापनों में भी कहा जाता है कि 5 वर्ष तक बुद्धि का 90% विकास हो चुका होता है।
इसलिए ज़रूरी है कि हम उनके दिमागी विकास पर शुरू से ध्यान दें। रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ही हम बच्चों से कुछ सवाल करके उनकी मेमोरी को मज़बूत कर सकते हैं, जैसे:
- आज स्कूल में क्या पढ़ाया गया?
- तुम्हारे फ्रेंड्स के नाम क्या हैं?
- आज तुमने कौन सा खेल खेला?
नैतिक मूल्य और सामाजिक शिक्षा
कहानियाँ अक्सर नैतिक शिक्षा देती हैं, जैसे ईमानदारी, दयालुता और कड़ी मेहनत का महत्व। कहानियों के माध्यम से बच्चे सही और गलत के बीच अंतर करना सीखते हैं। यह उन्हें समाज के नियमों और अपेक्षाओं को समझने में भी मदद करता है। वे कहानियों में पात्रों के संघर्षों और सफलताओं से सीखते हैं, जिससे उनके सामाजिक कौशल और समस्या-समाधान की क्षमता विकसित होती है।
कहानी पढ़ना बनाम वीडियो देखना
जब हम एक अच्छी कहानी की किताब पढ़ते हैं, तो हमारे मन में एक कल्पनाओं की वीडियो चलने लगती है। लेकिन जब हम वही कहानी मोबाइल या टीवी पर देखते हैं, तो दिमाग़ उतना सक्रिय नहीं होता।
(शायद आप 100% सहमत न हों, लेकिन यह सच्चाई है कि कल्पनाशक्ति केवल पढ़ने से उभरती है।)
बुजुर्गों की बातों में छिपा विज्ञान
हमारे बुजुर्गों की परंपराएं सिर्फ संस्कृति नहीं थीं, उनमें गहरा विज्ञान छिपा था। कहानी सुनाना भी एक ऐसी परंपरा थी जो बच्चे के मस्तिष्क, भाषा, भावनात्मक जुड़ाव और नैतिक मूल्यों के विकास में मदद करती थी। यह हमें बताता है कि बच्चों को कहानी क्यों सुनानी चाहिए यह सदियों से चली आ रही एक अहम ज़रूरत है।
निष्कर्ष
कहानी सिर्फ मनोरंजन नहीं है – यह स्मृति, कल्पनाशक्ति और रिश्तों में जुड़ाव का एक अनोखा जरिया है। इसीलिए, बच्चों को कहानी क्यों सुनानी चाहिए इस प्रश्न का उत्तर बेहद सरल है।
इसलिए सिर्फ बच्चों को ही नहीं, बड़ों को भी कहानियाँ सुनाई जानी चाहिए। कभी आप सुनाएं, कभी बच्चों से सुनें – कहानियों की ये आदान-प्रदान की परंपरा रिश्तों में एक मिठास भर देती है।
चलते-चलते इतना ही कहूँगा –
“जो बात किताबों में नहीं मिलती, वो एक अच्छी कहानी सिखा सकती है।”
“आपको अपने बचपन की कौन सी कहानी याद है? नीचे कमेंट बॉक्स में हमें बताएं!”
Lekh padkar bachpan yaad aagai. Kahaniyo ka mahatva pata chala.
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