
भारत में भ्रष्टाचार कब और कहाँ से शुरू हुआ?
भ्रष्टाचार कोई नया रोग नहीं है। इसकी जड़ें भारत के इतिहास में गहरी पैठी हुई हैं। लेकिन भ्रष्टाचार का मनोविज्ञान इससे कहीं ज़्यादा जटिल है। अगर हम ब्रिटिश शासन काल को देखें, तो यह समस्या और तेज़ी से बढ़ती दिखाई देती है।
1757 की प्लासी की लड़ाई के बाद जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल की दीवानी अपने हाथ में ली, तभी से सत्ता और लाभ के बीच का रिश्ता बिगड़ने लगा।
उस दौर में भी भ्रष्टाचार के किस्से आम थे। नवाब सिराजुद्दौला ने कंपनी के अधिकारियों पर गैरकानूनी व्यापार और कर चोरी के आरोप लगाए थे।
ब्रिटिश संसद में भी यह चर्चा होती थी कि भारत से लौटने वाले “नवाब” कहलाने वाले कंपनी अधिकारी बेहिसाब दौलत लेकर आते हैं।
इतना ही नहीं, 1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट इसी भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए लाया गया था।
आज़ादी के बाद सोचा गया था कि हालात बदलेंगे, लेकिन सच्चाई यह है कि भ्रष्टाचार एक ऐसे वायरस की तरह फैल चुका है जो इंसान के ज़मीर और पूरे सिस्टम — दोनों को खोखला कर देता है। और यही वजह है कि हमें भ्रष्टाचार की जड़ों को समझने के साथ-साथ इसके मुक़ाबले का विश्लेषण भी करना ज़रूरी है।
क्या भ्रष्टाचार का कोई मनोविज्ञान (Psychology) होता है?
हाँ, बिल्कुल होता है। यह सिर्फ पैसों का लालच नहीं है, बल्कि एक mindset है —
“जब सब कर रहे हैं, तो मैं क्यों नहीं?”
धीरे-धीरे लोग भ्रष्टाचार को crime नहीं, बल्कि smartness समझने लगते हैं।
ये कुछ आम self-justification के बहाने हैं:

- “मेरी salary तो कम है…”
- “System ही ऐसा है…”
- “सब कर रहे हैं…”
और जब यह सोच आदत में बदल जाती है, तब इंसान अपने गलत काम को गलत मानना ही बंद कर देता है।
पैसे लेने वाला बड़ा दोषी है या देने वाला?
ये chicken–egg वाला सवाल है।
- देने वाला कहता है — “मुझे काम कराना था, मजबूरी थी।”
- लेने वाला कहता है — “मेरी salary से क्या होता है? System ही ऐसा है!”
असलियत यह है कि दोष दोनों का है। एक मजबूरी में देता है, दूसरा इसी मजबूरी को अपना धंधा बना लेता है।
क्या salary ही रिश्वत लेने की सबसे बड़ी वजह है?
नहीं। कई बड़े अधिकारियों की salary बहुत अच्छी होती है, फिर भी वे रिश्वत लेते हैं।
असल वजह है — uncontrolled greed (बेकाबू लालच)।
सोच यही रहती है:
“एक घर और ले लूँ… एक plot और खरीद लूँ… बच्चों को foreign भेज दूँ…”
और यह लालच कभी रुकता ही नहीं।
रिश्वत और forcefully भीख माँगने में क्या फर्क है?
कभी-कभी तो फर्क ही मिट जाता है।
रिश्वतखोर सीधे मजबूर नहीं करता, लेकिन system को इतना slow कर देता है कि सामने वाला खुद रिश्वत देने के लिए तैयार हो जाए।
यह modern era की white collar begging है — जहाँ uniform पहनकर और file घुमाकर भीख ली जाती है।
क्या भ्रष्टाचार में पुरुष और महिलाएँ बराबर हैं?
पहले माना जाता था कि महिलाएँ इस मामले में अपेक्षाकृत ईमानदार होती हैं। लेकिन अब हालात बदल गए हैं।
Transparency International और CBI की internal reports के अनुसार:
- सरकारी विभागों में महिला अधिकारियों के खिलाफ़ दर्ज भ्रष्टाचार मामलों का प्रतिशत लगभग 15–18% है।
- पुरुषों के मुक़ाबले यह संख्या कम है, लेकिन यह भी साबित करता है कि भ्रष्टाचार अब gender-neutral हो चुका है।
यानि जब system खराब है, तो वह सबको बिगाड़ता है — चाहे male officer हो या female।
क्या भ्रष्टाचार करने वालों को उनके परिवार support करते हैं?
अक्सर हाँ।
जब घर वाले चुप रहते हैं या उस पैसे से फायदा उठाते हैं — नया घर, गाड़ी, महंगी पढ़ाई — तो वे भी अप्रत्यक्ष रूप से इस “support system” का हिस्सा बन जाते हैं।
अगर घरवाले कहें:
“पाप की कमाई घर मत लाओ”,
तो शायद कई लोग दो बार सोचें।
क्या भ्रष्टाचार को legal बना देना चाहिए?
कभी-कभी frustration में लोग कहते हैं —
“घूसखोरों को license दे दो, उस पर tax लगा लो, कम से कम openly काम तो होगा!”
लेकिन सच्चाई यह है कि अगर ऐसा किया गया तो लोग उसमें भी चोरी ढूँढ लेंगे।
Backdoor bribery शुरू हो जाएगी।
भ्रष्टाचार से समाज का पूरा ecosystem कैसे बिगड़ता है?
मान लीजिए किसी ने illegal पैसे से एक 10 लाख की ज़मीन 15 लाख में खरीद ली।
असल ज़रूरतमंद उस घर से बाहर हो गया और corrupt आदमी ने अपना illegal money property में बदल लिया।
इसी तरह corrupt लोग अपने बच्चों को best education, foreign exposure और अच्छी jobs दिला देते हैं — जबकि एक honest इंसान struggle करता रह जाता है।
धीरे-धीरे एक पूरी corrupt elite class तैयार हो जाती है, जो society में नया divide बना देती है।
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यह सवाल आपके लेख के मुख्य विषय ‘भ्रष्टाचार का मनोविज्ञान’ और ‘समाधान’ दोनों से जुड़ा है, और एक नया, महत्वपूर्ण आयाम (dimension) जोड़ता है:
भ्रष्टाचार से लड़ने में ‘नैतिक शिक्षा’ की क्या भूमिका है? क्या सिर्फ क़ानून काफी हैं?
भ्रष्टाचार को सिर्फ़ क़ानूनों (laws) या एजेंसियों (agencies) से नहीं रोका जा सकता; इसकी लड़ाई इंसान के चरित्र (character) से शुरू होती है। अगर हम मान रहे हैं कि भ्रष्टाचार एक मानसिक रोग (mental disease) है, तो इसका इलाज भी मानसिकता के स्तर पर होना चाहिए।
यहीं पर नैतिक शिक्षा (Ethical Education) की भूमिका आती है। शिक्षा व्यवस्था को सिर्फ़ डिग्री देने वाली मशीन नहीं बनना चाहिए, बल्कि उसे बच्चों में ईमानदारी, जवाबदेही और सहनुभूति जैसे मूलभूत मानवीय मूल्यों को विकसित करना चाहिए।
नैतिक शिक्षा की ज़रूरत क्यों है:
- जड़ पर हमला: नैतिक शिक्षा बच्चों को यह सिखाती है कि ग़लत काम करना सिर्फ़ एक अपराध नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज को नुकसान पहुँचाता है। यह ‘जब सब कर रहे हैं, तो मैं क्यों नहीं?’ वाली मानसिकता की जड़ पर प्रहार करती है।
- ज़मीर का निर्माण: यह बच्चों के भीतर एक मज़बूत ज़मीर (Conscience) का निर्माण करती है, जो उन्हें बड़े होकर दबाव में भी ग़लत काम करने से रोकता है। यह शिक्षा ही नैतिक साहस (Moral Courage) पैदा करती है, जो रिश्वत लेने या देने से मना करने के लिए ज़रूरी है।
- पारदर्शिता की संस्कृति: स्कूलों और कॉलेजों में पारदर्शिता (Transparency) और जवाबदेही (Accountability) के उदाहरण सेट किए जाने चाहिए। जब एक युवा देखता है कि उसका सिस्टम नैतिक मूल्यों पर चलता है, तो वह भी उसी संस्कृति को अपनाता है।
तो समाधान क्या है?
- Accountability और Transparency — हर स्तर पर।
- Whistleblower protection — ताकि जो गलत के खिलाफ बोले, वह सुरक्षित रहे।
- Strong punishment — सिर्फ़ file घुमाकर नहीं, real action लेकर।
- Public awareness — ताकि लोग bribery को smartness नहीं, शर्म मानें।
अंतिम बात
भ्रष्टाचार का मनोविज्ञान हमें बताता है कि यह सिर्फ़ कानून की नहीं, बल्कि ज़मीर की लड़ाई है। लालच का यह मानसिक रोग तभी ठीक होगा, जब हम सामूहिक रूप से इसका विरोध करेंगे। जब तक हम यह न सोचें कि “मेरे बिना system नहीं बदलेगा”, तब तक कुछ भी नहीं बदलेगा।
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