डिजिटल साक्षरता: “डिजिटल स्नेहित” – 2019 की एक अधूरी कहानी

युवा व्यक्ति अपने बुजुर्ग माता-पिता और परिजनों को टैबलेट और डिजिटल तकनीक का उपयोग सिखाता हुआ – डिजिटल साक्षरता और डिजिटल वेलबीइंग का उदाहरण

परिचय: एक आइडिया जो दिल से निकला था

हमारी ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसे फैसले होते हैं जो हमें सीख देते हैं – चाहे वो सफल हों या असफल। डिजिटल साक्षरता के क्षेत्र में, मैंने 2019 में एक ऐसा ही प्रयोग किया, जो मेरे दिल के बहुत करीब था।

समस्या जो सामने दिख रही थी

2019 तक अधिकतर लोगों के हाथ में स्मार्टफोन आ चुका था। लेकिन एक बात जो मैं नोटिस कर रहा था, वो ये कि कई लोग – खासकर बुजुर्ग और कम पढ़े-लिखे लोग – इन स्मार्टफोन का सही उपयोग नहीं कर पा रहे थे।

छोटे-छोटे उदाहरण जैसे:

  • कोई बुजुर्ग व्यक्ति जब किसी S नाम वाले contact को ढूंढना चाहता, तो नीचे तक स्क्रॉल करता जाता, लेकिन सीधे सर्च बॉक्स में ‘S’ टाइप नहीं करता।
  • कुछ लोग मोबाइल को इतनी जोर से swipe करते कि screen ही हिल जाए!

मुझे ये देख कर साफ समझ में आने लगा कि स्मार्टफोन तो है, पर डिजिटल साक्षरता नहीं है। और इसी डिजिटल अधूरी समझ की वजह से लोग अपना पैसा, समय और कभी-कभी निजता भी गंवा रहे थे।

एक सोच का जन्म: कुछ करना है

मैं खुद एक कंप्यूटर प्रोफेशनल हूं – 1996 से तकनीक के साथ काम कर रहा हूं। इसलिए जब ये समस्या दिखाई दी, तो लगा कुछ करना चाहिए। मैंने अपने करीबी दोस्तों से बात की – उन्हें भी मेरा विचार पसंद आया।

हमारा उद्देश्य था:

  • बुजुर्गों और तकनीक से अनजान लोगों को यह सिखाना कि स्मार्टफोन को स्मार्ट तरीके से कैसे इस्तेमाल किया जाए।

हमारा फोकस था:

  • मोबाइल का सही इस्तेमाल
  • जरूरी ऐप्स को समझना
  • Data का बैकअप कैसे लें
  • खासकर UPI और नेट बैंकिंग का सुरक्षित उपयोग

Digital Snehit: शुरुआत उम्मीदों भरी

हमने इस प्रोजेक्ट को एक नाम दिया – Digital Snehit (डिजिटल दोस्त)। हमने प्रोजेक्टर खरीदा ताकि मोबाइल स्क्रीन को लाइव दिखाकर क्लास ली जा सके। Poster, Marketing templates, Chairs, Training Boards – लगभग ₹40,000 तक निवेश कर दिया।

हमने पहले कुछ लोगों से राय ली – सबने कहा “बहुत अच्छा काम है”, “हमारे माता-पिता को भी ऐसी ट्रेनिंग की ज़रूरत है”, “जरूर बताना कब शुरू कर रहे हो”, आदि। सबके प्रोत्साहन से हमने एक दिन तय किया और शानदार उद्घाटन किया। स्थानीय प्रतिष्ठित लोगों को बुलाया, मेहमान आए, प्रशंसा हुई, तालियाँ बजीं, और हमने सोचा – अब तो सफलता पक्की है।

सच का सामना: जब ज़मीन हकीकत दिखाती है

उद्घाटन के अगले ही दिन से असली परीक्षा शुरू हुई। हमने लोगों को आमंत्रित किया – “आइए, स्मार्टफोन चलाना सीखिए”, पर जवाब था:

  • “मोबाइल में क्या सीखना? बस उंगली घुमाओ, सब चल जाता है।”
  • “हमारे बच्चे हमें बैंकिंग सिखा देते हैं, बाहर क्यों जाएं?”
  • “सिखाने में पैसा लगेगा क्या? और टाइम कौन निकाले?”

जिन्होंने कहा था कि ‘जरूर आएंगे’, वही लोग मुकर गए। शायद उन्हें लगा कि मोबाइल सीखना कोई गंभीर चीज नहीं है। हम समझ गए – डिजिटल साक्षरता की आवश्यकता थी, पर जागरूकता नहीं थी। हमारा सपना, मेहनत और पैसा – सब एकदम से जैसे ज़मीन में समा गया।

आज भी जब सोचता हूं…

जब आज भी किसी खबर में पढ़ता हूं – “सरकार डिजिटल साक्षरता पर अभियान चला रही है”, या जब देखता हूं किसी गांव में बुजुर्गों को UPI की ट्रेनिंग दी जा रही है – तो मन में एक टीस उठती है। “यही तो हमने 2019 में करने की कोशिश की थी!”

मेरी सीख: स्मार्टफोन एक कार की तरह है

मुझे आज भी लगता है कि स्मार्टफोन एक आधुनिक गाड़ी की तरह है। अगर आप चलाना नहीं जानते और सीधे सड़क पर आ गए, तो दुर्घटना निश्चित है। ठीक वैसे ही, अगर कोई UPI और net banking जैसे टूल्स को बिना समझे इस्तेमाल करता है – तो डिजिटल फ्रॉड्स, गलत ट्रांजेक्शन और डेटा लॉस जैसे खतरे हमेशा बने रहते हैं। यही कारण है कि डिजिटल साक्षरता आज के समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है।

निष्कर्ष: असफलता भी शिक्षक होती है

Digital Snehit एक फेल प्रोजेक्ट था – लेकिन एक सच्चा अनुभव था। इसने सिखाया कि किसी समाज में परिवर्तन लाने के लिए सिर्फ योजना और जुनून काफी नहीं, लोगों की मानसिकता को भी बदलना पड़ता है, खासकर जब बात डिजिटल साक्षरता जैसे बड़े बदलाव की हो। शायद भविष्य में एक दिन, यही आइडिया फिर लौटे – और इस बार, लोग इसके लिए तैयार हों।

**क्या आपका भी कोई ऐसा अनुभव है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी कहानी साझा करें।

“भारत में डिजिटल साक्षरता को लेकर कई पहलें चल रही हैं। उदाहरण के लिए, केरल भारत का पहला डिजिटल साक्षर राज्य है (स्रोत: JagranJosh).”

3 thoughts on “डिजिटल साक्षरता: “डिजिटल स्नेहित” – 2019 की एक अधूरी कहानी”

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