आजकल घर का खाना क्यों बेस्वाद लग रहा है?

डाइनिंग टेबल पर बैठे एक दंपति, पति और पत्नी घर का खाना खाते हुए बातचीत कर रहे हैं। पति चम्मच में खाना लिए हुए कुछ कह रहा है और पत्नी ध्यान से उसकी बात सुन रही है।

आजकल घर का खाना अक्सर बेस्वाद लगने की शिकायत सुनने को मिलती है।
लोग कहते हैं — घर में कितना भी अच्छा बना लो, पर स्वाद नहीं आता।

घर में कितना भी अच्छा खाना बना लो, पर स्वाद नहीं आता।”

कई बार पति अपनी पत्नी से यह तक कह देते हैं — ‘तुम्हें तो खाना बनाना ही नहीं आता, माँ तो कितना स्वादिष्ट बनाती थीं। “लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि माँ के हाथ के खाने में वो कौन-सी बात थी, जो आज हमें अपने खाने में महसूस नहीं होती?”

यह लेख मेरे व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित है। शायद हर किसी के लिए 100% सही न हो, लेकिन कहीं-न-कहीं, हर व्यक्ति ने इसे जरूर महसूस किया है।

माँ के हाथ का स्वाद — आज के खाने में क्यों नहीं?

जो लोग माँ के हाथ के खाने की तारीफ़ करते हैं, वे अक्सर उस स्वाद से दूर हो चुके होते हैं।
जैसे कोई शादीशुदा पुरुष, पत्नी के हाथ का खाना खाते-खाते माँ की रसोई को याद करता है — क्योंकि अब वह अपनी माँ से दूर रहता है।

यही दूरी उस स्वाद को और खास बना देती है।

पहले का अनाज, आज की खेती और बिगड़ता स्वाद

दो हिस्सों में बंटी तस्वीर: बाएँ तरफ एक किसान गेहूं की बालियाँ हाथ में लिए पारंपरिक तरीके से खेती करता दिख रहा है, जबकि दाएँ तरफ एक युवा किसान खेत में फसलों पर रसायन छिड़काव कर रहा है।

पहले:

  • ज़मीन ज़्यादा थी, लोग कम थे
  • सब कुछ धीरे-धीरे, प्राकृतिक तरीके से होता था
  • गाय का गोबर, समय पर बारिश और खेती का सही मौसम अच्छे स्वाद का कारण बनते थे

आज:

  • ज़्यादा उत्पादन का दबाव → Hybrid खेती, रासायनिक खाद
  • कम समय में फसल → Quantity है, पर Quality गायब है

उदाहरण:
मौसमी मेथी की सब्ज़ी पहले तैयार होने में 45 दिन लेती थी, अब Hybrid seeds से मात्र 18 दिन में आ जाती है।
तो स्वाद और पोषण कहाँ से आएगा?

👉 National Institute of Nutrition की एक रिपोर्ट बताती है कि पिछले 50 सालों में गेहूं और चावल में Iron और Zinc की मात्रा लगभग 30–40% तक कम हो चुकी है। यही कारण है कि “पेट भरने वाला” खाना भी अब “ताक़त देने वाला” नहीं रह गया।

बाहर का खाना vs. घर का खाना — एक झूठा मायाजाल

  • जब घर के खाने में स्वाद कम हुआ, तो लोग बाहर के खाने की तरफ आकर्षित हुए
  • TV Ads, Food Delivery Apps और “Tasting Powders” ने खाने में “फर्जी स्वाद” भर दिया
  • एक बार इस स्वाद की आदत लग जाए, तो घर का सादा, सच्चा खाना फीका लगने लगता है

और यहीं से शुरू होता है food addiction, जो धीरे-धीरे हमारी सेहत को खोखला कर देता है।

📊 एक छोटा आंकड़ा:


FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के लगभग 60% processed foods में High Sodium और Artificial Flavours पाए गए।
इसलिए अगर आज घर का खाना फीका लगता है, तो असली वजह taste buds का बिगड़ना है — न कि घर के खाने की कमी।

👉 WHO की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में 70% युवाओं की diet में High Salt, Sugar और Fat वाले foods का consumption recommended limit से ज़्यादा है।

कुछ relatable examples जो बताते हैं घर के खाने का महत्व

🍛 Example 1: शादी-ब्याह का खाना vs. घर का खाना

शादी या function में 20–25 तरह के पकवान मिलते हैं। लोग पेट भरकर खाते हैं और बाहर निकलते ही कहते हैं —
मज़ा गया!”

लेकिन वही लोग 2 दिन बाद दाल-चावल जैसे सादे घर के खाने को खाकर कहते हैं —
घर जैसा सुकून कहीं नहीं।”

यानी variety और मसाले instant happiness दे सकते हैं, लेकिन long-term comfort वही simple घर का खाना देता है।

🍲 Example 2: hostel / PG life का सच

कई छात्रों को जब पहली बार hostel या PG में रहना पड़ता है, तो सबसे बड़ी शिकायत यही होती है —
यहाँ का खाना तो बेस्वाद है, घर जैसा नहीं।”

असल में वो खाना उतना बुरा नहीं होता, लेकिन उसमें माँ के हाथ का care और personal touch नहीं होता। यही फर्क उसे फीका बना देता है।

आज की पीढ़ी और “Add-on Culture”

आज हर चीज़ में “extra” चाहिए:

  • खाना → बिना tasting powder के नहीं चलेगा
  • बच्चे → स्कूल के बाद extra coaching
  • शरीर → Gym के बिना workout अधूरा
  • नींद → Mobile detox के बिना पूरी नहीं

पहले:

  • खाने में स्वाद था, शरीर में ताक़त थी
  • माँ की रसोई में chemical नहीं, प्यार का तड़का था

माँ के हाथ के खाने की खासियत

मुस्कुराती हुई माँ अपने बच्चों को थाली में दाल और सब्ज़ी परोस रही है, बच्चे खुशी से घर का बना खाना खा रहे हैं।
  • माँ खाना सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि प्यार से परोसने के लिए बनाती थी
  • वो हमें देखकर, हमारी पसंद जानकर, मुस्कुराकर परोसती थी
  • वही दाल-चावल, वही सब्ज़ी माँ की serving से “special” बन जाते थे

आज जब हम घर से दूर हैं, तो वही थाली, वही दाल, वही सब्ज़ी एक याद बन जाती है।

👉 2019 में एक survey (YouGov) में पाया गया कि 76% भारतीय अपनी माँ के हाथ के खाने को “life’s best comfort food” मानते हैं। यानी घर का खाना सिर्फ स्वाद नहीं, एक भावना है।

बदलते रिश्तों का चक्र

जो बच्चे आज अपनी माँ के हाथ का खाना खा रहे हैं, वही 20 साल बाद बड़े होकर जब खाना खाएँगे तो उस स्वाद को याद करते हुए कहेंगे — “माँ के हाथ का स्वाद भूलना आसान नहीं।”
जैसे आज पति अपनी माँ के हाथ के खाने को याद करते हैं, वैसे ही कल उनके बच्चे भी अपनी माँ के हाथ के खाने को याद करेंगे।

निष्कर्ष: घर के खाने का महत्व

खाने को कोसने से पहले ज़मीनी हकीकत को समझना ज़रूरी है।
घर के खाने में सेहत है, बाहर के खाने में “चटपटा स्वाद” है।

👉 चुनाव हमारा है — सेहत या स्वाद?

और अंत में, ये भी याद रखिए —
माँ के हाथ का खाना कभी सिर्फ “recipe” नहीं होता, वो एक memory + emotion होता है।

और हाँ, यह याद सिर्फ पतियों तक सीमित नहीं है। पत्नियाँ भी जब मायके जाती हैं, तो सबसे पहले अपनी माँ के हाथ का खाना ही ढूँढती हैं।
क्योंकि माँ तो माँ होती है — उसके हाथ का स्वाद हर किसी के लिए खास होता है, चाहे बेटा हो या बेटी।

आपके लिए सवाल

क्या आपको भी अपनी माँ के हाथ की कोई खास recipe याद आती है?
या फिर क्या आप आज भी उस स्वाद को miss करते हैं?

1 thought on “आजकल घर का खाना क्यों बेस्वाद लग रहा है?”

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