मुद्रा गिरावट: हमारी खरीदने की शक्ति घटती जा रही है

₹5 का बिस्किट: नोट वही, पेट नहीं भरता

₹5 की कीमत वही रहते हुए बिस्किट के पैकेट का आकार और मात्रा कम होने को दिखाता तुलनात्मक चित्र, जिसमें 10 साल पहले और आज की स्थिति के जरिए महंगाई और बच्चों के पोषण पर पड़ते असर को दर्शाया गया है।

लगभग 10 साल पहले ₹5 में एक बड़ा Biscuit-G पैकेट मिलता था, लगभग 75–80 ग्राम का। आज वही ₹5 सिर्फ़ 50–55 ग्राम का छोटा पैकेट देता है। पैकेट छोटा हुआ, पोषण कम हुआ, और इसका असर बच्चों की सेहत पर भी पड़ता है। यही दिखाता है कि हमारी खरीदने की शक्ति घटती जा रही है।

रसोई गैस सिलेंडर: ज़रूरत वही, बोझ ज़्यादा

2015 और 2025 के बीच घरेलू LPG गैस सिलेंडर की कीमत में बढ़ोतरी को दर्शाता तुलनात्मक चित्र, जहाँ 2015 में ₹630 और 2025 में ₹880 कीमत दिखाकर यह बताया गया है कि समय के साथ हमारी खरीदने की शक्ति घटती जा रही है।

एक ही रसोई, एक ही गैस सिलेंडर — पर कीमत साल दर साल बढ़ती चली गई। मेहनत की कमाई पहले गैस में जल रही है, और यही बताता है कि हमारी खरीदने की शक्ति घटती जा रही है।”

खाने का तेल: स्वाद वही, खर्च दोगुना

2015 और 2025 के बीच 1 लीटर सनफ्लावर खाद्य तेल की कीमत में बढ़ोतरी को दिखाता तुलनात्मक चित्र, जहाँ 2015 में कीमत ₹85 और 2025 में ₹155 दर्शाई गई है, जो महंगाई और समय के साथ घटती खरीदने की शक्ति को उजागर करता है।”

तेल वही है, ज़रूरत वही — पर हर बार बिल थोड़ा भारी हो जाता है।महंगाई की यह चुपचाप बढ़ती कीमत सीधे घर की बचत पर असर डालती है।

मोबाइल रिचार्ज: सुविधा बढ़ी, कीमत उससे तेज़

2017 और 2025 के 84 दिनों वाले मोबाइल रिचार्ज प्लान का तुलनात्मक चित्र, जिसमें 2017 में कीमत ₹399 और 2025 में लगभग ₹950 दिखाई गई है, जो समय के साथ घटती खरीदने की शक्ति को दर्शाता है।

2017 में 84 दिनों का मोबाइल रिचार्ज ₹399 में मिल जाता था। 2025 में वही अवधि लगभग ₹950 तक पहुँच चुकी है। योजनाओं में डाटा और सुविधाओं में थोड़ा-बहुत बदलाव जरूर हुआ है, लेकिन आम व्यक्ति की जेब पर बढ़ता बोझ साफ दिखाई देता है।

स्कूटर की कीमत: सपनों की रफ्तार धीमी पड़ती

2015 और 2025 के बीच एक समान 110cc स्कूटर की कीमत में बढ़ोतरी को दिखाता तुलनात्मक चित्र, जिसमें 2015 में कीमत ₹60,000 और 2025 में ₹1,00,000 दिखाई गई है, जो समय के साथ हमारी खरीदने की शक्ति घटती जा रही है को दर्शाता है।”

2015 में एक सामान्य 110cc स्कूटर ₹60,000 में मिलता था। 2025 में वही मॉडल अब लगभग ₹1,00,000 का हो गया है। कुछ नए फीचर्स जरूर जोड़े गए हैं, लेकिन कीमत में यह बढ़ोतरी आम आदमी की जेब पर भारी पड़ती है। सिर्फ स्कूटर ही नहीं, बल्कि हमारी खरीदने की शक्ति भी समय के साथ घटती जा रही है।

मध्यवर्ग की थाली से बजट तक: हमारी खरीदने की शक्ति घटती जा रही है

आज के समय में हम देखते हैं कि कुछ चीजों की कीमतें हमारी जरूरतों से कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही हैं। जैसे रसोई का तेल, दालें, दूध, सब्ज़ियाँ और गैस सिलेंडर — ये सभी रोज़मर्रा की वस्तुएँ हैं, जिनके बिना सामान्य जीवन चलाना मुश्किल हो जाता है। दूसरी ओर, कुछ चीजों की कीमतें केवल समय और मांग के अनुसार धीरे-धीरे बढ़ रही हैं, जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामान या वाहन। यह अंतर साफ तौर पर दिखाता है कि महंगाई हर वस्तु पर एक समान असर नहीं डाल रही है।

वहीं दूसरी ओर, हमारे देश में आम लोगों की आय की स्थिति भी बहुत विषम है। कुछ लोग लाखों रुपये की सालाना सैलरी कमाते हैं, जबकि कुछ लोगों की मासिक आय भी हजारों में सीमित है। छोटे व्यवसायी या मजदूर तो दिन की कमाई के लिए ही संघर्ष करते हैं, और उनकी आमदनी ₹100-₹500 के बीच भी नहीं रहती। ऐसे में जब रोज़मर्रा की चीजों की कीमतें बढ़ती हैं और मुद्रा की खरीदने की शक्ति घटती है, तो वही मध्यम और निम्न वर्ग परिवार आर्थिक रूप से दबाव में आ जाते हैं।

इसका असर सीधे उनके जीवन और पोषण पर पड़ता है। उदाहरण के तौर पर, ₹5 की बिस्कुट या 1 लीटर तेल की कीमत में पिछले दस सालों में इतनी वृद्धि हुई कि वही छोटी राशि अब पहले जैसी सुविधा या पोषण नहीं दे पाती। यह केवल आंकड़े नहीं, बल्कि हकीकत में उन परिवारों की स्थिति दर्शाता है जो हर महीने के बजट के हिसाब से ही खर्च करते हैं। छोटे बच्चों की पोषण संबंधी जरूरतें भी पूरी नहीं हो पातीं, और घर की बचत लगातार कम होती जाती है।

इस सबके बावजूद मीडिया और सरकारी रिपोर्ट्स में अक्सर GDP, GST collection, stock market या बड़ी कंपनियों के मुनाफे की खबरें आती हैं, जो यह संकेत देती हैं कि अर्थव्यवस्था अच्छी चल रही है। लेकिन इस “अच्छाई” का लाभ आम नागरिक तक अक्सर नहीं पहुँचता। यही असली सच है, जिसे शायद ही कभी सार्वजनिक चर्चा में पूरी तरह उठाया जाता है। आम आदमी के लिए, कीमतों का बढ़ना और आय का असमान होना सीधे जीवन पर असर डालता है, और यही मुद्रास्फीति का दूसरा, कम दिखने वाला पहलू है।

इसलिए यह आवश्यक है कि जब हम महंगाई, GDP और आमदनी की रिपोर्ट्स देखें, तो उनके पीछे छिपे असमान प्रभाव को भी समझें। सिर्फ़ आंकड़े और headlines नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की कहानियाँ और छोटे परिवारों पर पड़ने वाले प्रभाव हमें यह याद दिलाते हैं कि “हमारी खरीदने की शक्ति घटती जा रही है,” और यह हर वर्ग को अलग तरीके से प्रभावित कर रही है।

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