🌳 वृक्ष-माता: ‘सालुमरदा तिम्मक्का’- Saalu Marada Timmakka

“सालुमरदा तिम्मक्का” केवल एक नाम नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिए अदम्य साहस और निःस्वार्थ प्रेम का जीता-जागता प्रतीक हैं। कर्नाटक की इस महान आत्मा ने सिद्ध कर दिया कि अगर इरादे नेक और दृढ़ हों, तो कोई भी व्यक्ति अपने छोटे से प्रयास से इस धरती पर कितना बड़ा और अमूल्य योगदान दे सकता है।

सालुमरदा तिम्मक्का हरे रंग की साड़ी में हरे घास के बीच बैठी हैं और अपने हाथों को जोड़कर देख रही हैं।

🌿 जीवन का परिचय और संघर्ष

सालुमरदा तिम्मक्का का जन्म गुब्बी तालुक, Tumakuru जिला, कर्नाटक में हुआ था। उन्होंने कभी औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की और उनका शुरुआती जीवन बेहद गरीबी और संघर्ष में बीता।

  • “सालुमरदा” का अर्थ: सालुमरदा तिम्मक्का एक कन्नड़ शब्द है जिसका अर्थ है: “पंक्तियों में वृक्ष लगाने वाली तिम्मक्का।” ( कन्नड़ शब्द ‘सालु’ का अर्थ है ‘पंक्ति’ या ‘कतार’ और ‘मरदा’ का अर्थ है ‘वृक्षों का’ या ‘वृक्ष’।)
  • यह उपाधि उन्हें उनके महान कार्य के कारण मिली, जिसका अर्थ है “पेड़ों की कतारें”
  • निःसंतानता का दर्द और नया संकल्प: संतान न होने के दर्द को दूर करने के लिए, तिम्मक्का और उनके पति, श्री चिक्कैया, ने एक अनोखा संकल्प लिया। उन्होंने पेड़ों को ही अपने बच्चों के रूप में पालने का निर्णय किया।

🌱 महान कार्य: वृक्षों से भरा ममता का आँचल

सालुमरदा तिम्मक्का का सबसे बड़ा योगदान हुलिकलकुदुर के बीच 4.5 किलोमीटर लंबी सड़क के किनारे बरगद के पेड़ों की कतार लगाना और उन्हें पालना था।

  • वृक्षारोपण का सफर: उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर लगभग 385 बरगद के पेड़ लगाए।
  • सालुमरदा तिम्मक्का अब तक लगभग 8,000 पेड़ लगाए और उनकी देखभाल की है।
  • बच्चों जैसा पोषण: तिम्मक्का ने इन नन्हे पौधों को पालने में वो ममता और समर्पण दिखाया जो एक माँ अपने बच्चों के लिए करती है।
    • वह हर सुबह मीलों पैदल चलकर मटकों में पानी लाती थीं और हर पौधे को पानी देती थीं।
    • उन्होंने बारिश के मौसम में भी उनकी देखभाल की और काँटेदार बाड़ लगाकर मवेशियों से उनकी रक्षा की।
    • उनके लिए, ये पेड़ केवल पौधे नहीं थे, बल्कि उनके दत्तक बच्चे” थे, जिन्हें उन्होंने 80 से अधिक वर्षों तक पाल-पोस कर बड़ा किया।
    • विरासत: आज, उनके लगाए हुए पेड़ों का मूल्य $1.5 मिलियन (लगभग 12 करोड़ रुपये) से अधिक आंका गया है और वे हजारों यात्रियों को छाया और शुद्ध हवा प्रदान करते हैं।

तिम्मक्का का जीवन हमें सिखाता है कि हम सभी अपने आस-पास के पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदार हैं। उन्होंने बिना किसी स्वार्थ या सरकारी मदद के जो कार्य किया, वह हमारी पीढ़ियों को प्रकृति से प्रेम और संरक्षण का पाठ पढ़ाता रहेगा।


🏆 सम्मान और पहचान

इस तस्वीर में सालुमरदा तिम्मक्का, पूर्व राष्ट्रपति (श्री) कोविंद जी से पुरस्कार ग्रहण करते हुए दिखाई दे रही हैं।

सालुमरदा तिम्मक्का के इस अमूल्य योगदान को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है:

  • पद्म श्री (Padma Shri): 2019 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित।
  • राष्ट्रीय नागरिक पुरस्कार (National Citizen’s Award): भारत सरकार द्वारा सम्मानित।
  • अन्य सम्मान: उन्हें कई अन्य राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा भी सम्मानित किया गया है।

🏥 सामाजिक चिंतन: वृक्षों से परे भी मानवता की सेवा

सालुमरदा तिम्मक्का का विशाल हृदय केवल वृक्षों तक ही सीमित नहीं रहा। पर्यावरण के प्रति उनका समर्पण तो महान था ही, लेकिन उन्होंने अपने समुदाय और मानवता के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई।

अपनी सीमित आय और मिलने वाले सम्मान राशियों का उपयोग करते हुए, उन्होंने अपने गृह क्षेत्र में लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कदम उठाए। उनका एक महत्वपूर्ण सामाजिक कार्य स्थानीय निवासियों के लिए एक अस्पताल (Hospital) या स्वास्थ्य केंद्र के निर्माण में सक्रिय योगदान देना रहा है।

उनका मानना था कि जिस तरह उन्होंने प्रकृति को जीवन दिया, उसी तरह बीमार और जरूरतमंद लोगों को स्वास्थ्य प्रदान करना भी सर्वोच्च धर्म है। यह दर्शाता है कि तिम्मक्का केवल एक पर्यावरणविद् नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी सामाजिक कार्यकर्ता थीं जिनकी करुणा और सेवा-भावना का विस्तार हर जीवित प्राणी के कल्याण तक था।

निष्कर्ष: ममता का कर्ज और विकास की विडंबना

सालुमरदा तिम्मक्का का जीवन एक ऐसा आईना है, जो हमें हमारी प्राथमिकताओं पर विचार करने के लिए मजबूर करता है।

वहीं, दूसरी ओर, हम तथाकथित ‘विकसित’ समाज के लोग हैं। विकास (Development) के नाम पर हमने हमेशा सबसे पहले कुल्हाड़ी उन्हीं ‘बच्चों’ पर चलाई है जिन्हें पालने में तिम्मक्का ने अपना पूरा जीवन खपा दिया।

तिम्मक्का ने तो अपना ममता का कर्ज चुका दिया—पेड़ों को बड़ा करके। अब सवाल यह है कि:

क्या हम, इस आधुनिक युग के लोग, तिम्मक्का के लगाए हुए इन हरे-भरे ‘बच्चों’ को बचाकर, अपनी इंसानियत और कृतज्ञता का कर्ज चुका पाएंगे?”

‘सालुमरदा तिम्मक्का’ हमें यह अहसास कराती हैं कि असली विकास” कंक्रीट के जंगल खड़े करने में नहीं, बल्कि उन जीवनदायी साँसों (पेड़ों) को सहेजने में है, जिन्हें उन्होंने हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनमोल विरासत के रूप में सौंप दिया है।

हमारी सामूहिक प्रार्थना बस इतनी है: तिम्मक्का, आपने जिन वृक्षों को अपनी ममता से सींचा है, कम से कम उन पर तो अब कोई ‘विकास’ की कुल्हाड़ी चले।”

हम ‘Digichintan’ पर, कर्नाटक की इस ‘वृक्ष-माता’ के असीम प्रेम और निस्वार्थ सेवा को सलाम करते हैं!

3 thoughts on “🌳 वृक्ष-माता: ‘सालुमरदा तिम्मक्का’- Saalu Marada Timmakka”

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